संसद का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने छीना



नई दिल्ली : 12 मई 2017, अनुसूचित जाति/जनजाति संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज ने आज कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायधीश सी.एस. कर्णन के कार्य को छीन कर और छः महीने की सजा देकर संसद के अधिकार क्षेत्र का हनन किया | संविधान की धारा 214 और 124 में स्पष्ट है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को संसद ही अभियोग के माध्यम से हटा सकती है | पहले सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं के निर्णय से जजों की नियुक्ति का अधिकार छीना और अब उनके हटाने का भी | इससे जो संविधान में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में संतुलन था वह बिगड़ा है | अगर जस्टिस कर्णन की गलती थी तो सुप्रीम कोर्ट जांच करके मामले को संसद भेजना चाहिये था और संसद ही अभियोग चलाकर जज को हटा सकती है | मान लेते हैं कि जस्टिस कर्णन ने गलती की लेकिन सुप्रीम कोर्ट को गलती नहीं करनी चाहिए थी |

डॉ. उदित राज ने आगे कहा कि सवाल केवल संसद के अधिकार छीनने तक का ही नही है बल्कि इससे देश में बहुत खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है | क्या देश सुप्रीम कोर्ट से ही चलेगा ? सुप्रीम कोर्ट के इस कृत्य से एक बात और स्पष्ट हो गयी कि क्यों सरकार के द्वारा सुझाये गए मेमोरंडम ऑफ़ प्रोसीजर की शर्तों को नहीं मान रहे हैं | इस तरह से सुप्रीम कोर्ट विधायिका अधिकार क्षेत्र को दिनों दिन छीनती जा रही है | अगर जस्टिस कर्णन का व्यवहार उचित नहीं है तो उसके लिए भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कोलोजियम जिम्मेदार हैं | क्यों नहीं नियुक्ति करते समय आचरण को भलीभांति जांचा गया |

परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज ने कहा कि जज के आचरण के बारे में केवल संसद में चर्चा हो सकती है | जिस तरह से जस्टिस कर्णन के साथ हुआ, कल किसी और जज के साथ हो सकता है और इससे न्यायपालिका के स्वायत्ता ख़त्म होगी | अपराधिक मामले पर बिना कानून की सुनवाई की प्रक्रिया के बगैर सजा सुनाई नहीं जा सकती है | जैसा कि इस केस में हुआ है | सुप्रीम कोर्ट का हाई कोर्ट के जज पर अनुशासनात्मक कार्यवाही बनती ही नहीं | मान लिया जाये किसी जज ने गलत कार्य किया अगर उसे कानून की प्रक्रिया के द्वारा सजा न सुनाकर सीधे कार्यवाही की जाती है तो कभी भी कोई जज जेल भेजा जा सकता है | इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान में लिया है | जस्टिस सी. एस. कर्णन ने भ्रष्टाचार के जो आरोप जजों पर लगाये है डाक्टरी जांच के लिए भी जबरदस्ती नहीं किया जा सकता है जैसा कि इस केस में किया गया | यह कहना की मीडिया में यह खबर न आये तो यहाँ सुप्रीम कोर्ट ने गलत किया है |

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